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Sunday, 15 September 2013

सुधीर मौर्य की कहानी : सुबह की कालिमा

अंकिता आज थोड़ा उलझन में है। वो जल्द से जल्द अपने रूम पर पहुँच जाना चाहती है। न जाने क्यूँ उसे लग रहा है, ऑटो काफी धीमे चल रहा है। वो ऑटो ड्राइवर को तेज़ चलाने के लिए बोलना चाहती है, पर कुछ सोच कर चुप रह जाती है। आज उसे निर्णय लेना है। जिसके लिए उसे शांति चाहिए, शांत जगह। इस समय उसे अपने कमरे से ज्यादा कोई और जगह मुनासिब नहीं लग रही है। पर आज न जाने क्यूँ यह रास्ता उसे कुछ ज्यादा ही लम्बा लग रहा है। वैसे तो वो रोज़ ही इन रास्तों से गुजरती है। यूनिवर्सिटी से उसके घर का रास्ता।

चाय का एक कप लेकर वो विंडो का पर्दा खिसका कर खड़ी हो जाती है। चाय का एक घूंट ले कर वो विंडो से नीचे नज़र दौड़ाती है। इस विंडो से वो एक पतली काली कोल तार की सड़क देख सकती है। रोज़ ही देखती है। इसमें अधिकतर पैदल राहगीर ही गुजरते है। कुछ दुपहिया वाहन भी। कभी कभार इक्का दुक्का लाइट मोटर व्हीकल भी। बड़े वहां गुजर नहीं सकते। सड़क के दोनों मुहाने पर जड़े वाहनों का प्रवेश निषेध का साइन बोर्ड भी लगा है।

वो चाय का वापस घूंट लेती है। इस वक़्त सड़क लगभग सून-सान है। इक्का-दुक्का लोग गुजर रहे है। तभी उसकी नज़र आ रहे तीन लोगों पर पड़ती है। एक लड़की, दो लड़के। अंकिता उन्हें तब तक देखती रहती है, जब तक वे उसकी खिड़की के नीचे से गुजर कर सड़क के दूसरे मुहाने से टर्न लेकर दिखना बंद नहीं हो पाते।

अंकिता उन तीनों को आखिरी बिंदु तक देखती है। उनकी परछाई के छिप जाने तक। उसके होठों पर मुस्कान तैर जाती है, कप चाय से खली हो चूका है, अंकिता किचन में जा कर खली कप वाशबेसिन में रखती है। वापस आ कर बीएड पर लेट जाती है। सर के नीचे तकिया रख कर आँखे मीच लेती है।

- आज उसे निर्णय लेना है।
- किसी और के लिए नहीं, खुद के लिए।
उसकी आँखों में एक के बाद एक, दो आते है।

- पहला चित्र है, समीर का। जो इसी गली के मुहाने पर बसे एक घर में किराये पर रहता है। पिछले छह-सात महीने से वो उसे जानती है। समीर, स्थानीय स्तर पर नाट्य संस्था से जुड़ा है। नुक्कड़ नाटक का मंचन करता है। खुद ही लिखता भी है और निर्देशित भी। पर अब तक उसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली है।

अंकिता एक नुक्कड़ नाटक देखने के समय समीर से मिली थी।


- पहली मुलाकात
- पहली मुलाक़ात में ही समीर, अंकिता को अलमस्त और खिल्दुंड नज़र आता है। हमेशा हँसता चेहरा, हमेशा मजाक के मूड में। पहली मुलाकात में ही समीर अंकिता से यू मिलता है ज्यों पहले कई बार मिल चूका हो।

उसका बेझिझक अंकिता को यार कह कर बुलाना, टाइम जानने के लिए बिना उसको पूछे, उसकी कलाई पकड़ कर घड़ी से टाइम देख लेना।सब कुछ इतनी आसानी से समीर ने किया मानो वो काफी पुराने दोस्त हो।

उसी दिन समीर उसे बाइक पर उसके काम तक छोड़ता है। अंकिता जब बाइक से उतर कर जब उसे थैंक्स बोलना चाहती है। तो वह हंसने लगता है दीवानावार, काफी देर बाद वो खुद को संयत करके ऊँगली से इशारा करके गली के दूसरे छोर को दिखा कर बोलता है, वहां है मेरा रूम। इतना करीब रह कर भी इतनी देर से मुलाकात, अंकिता भी हंस पड़ती है।

फिर वो अक्सर मिलने लगते है। दोस्ती प्रगाढ़ हो जाती है। पर उनके बीच प्यार जैसा कुछ नहीं। अंकिता ने कभी उसकी अनुमति भी नहीं दी।

आज सुबह समीर उसे प्रपोज करता है। जब वो यूनिवर्सिटी के लिए निकलती है, तो गली के दूसरे छोर पर समीर अपनी बाइक पर बैठा हुआ है, अंकिता को देख कर मुस्कराता है।

अंकिता उसकी बाइक पर बैठ जाती है। लगभग रोज़ का नियम है। समीर, अंकिता को चौराहे तक छोड़ता है, जहाँ से उसे यूनिवर्सिटी जाने के लिए ऑटो मिल जाता है। और समीर वहां से नाट्य मंडली की तरफ चला जाता है।

आज अंकिता जब बाइक से उतर कर बाय करके जाने लगी, तो दो मिनट प्लीज बोल कर समीर उसे रोक लेता है। अंकिता उस के पास आकर खड़ी हो जाती है।

बाइक से उतर कर समीर, अंकिता के करीब आता है और होंठो पर मुस्कान लाकर बिखेर कर कहता है- यार रोज़ खाना-नास्ता बनाने में और बर्तन धुलने में काफी टाइम निकल जाता है। इस वजह से मेरा काम में पूरा ध्यान नहीं लगता है।

- अंकिता चुप रहती है, उसे समीर की बात का कोई जवाब नहीं सूझता है।

- समीर आगे कहता है- मैं सोचता हूँ, ये काम तुम्हारे हवाले कर दूँ।

- अंकिता चौक पड़ती है- 'व्हाट' मैं लखनऊ में क्या आयागिरी करने आई हूँ, अरे मैं यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म की स्टूडेंट हूँ। आप ने ये कैसे सोच लिया।

खिलखिला कर हंस पड़ता है समीर, कई पलों तक निश्छल हंसी। फिर सांसे संयत करके कहता है- अरे समझी नहीं आप- अरे मैं ये काम आपको आया समझकर नहीं बल्कि अपनी बीवी की हैसियत से देना चाहता हूँ।

''मुझसे शादी करोगी'' - अंकिता जी।

- अचम्भित रह गयी थी अंकिता, समीर के प्रपोज के इस अंदाज पर। प्यार के रस्ते को पार करके सीधे शादी। चुप रह गयी वो। आँखे नीचे करके वहां से जाने लगी तो पीछे से समीर बोला- जवाब नहीं दिया अपने।

- वो रुकी नहीं चलते-चलते बोली इस टॉपिक पर फिर कभी बात करेंगे, अभी क्लास को देर हो रही है।
- अंकिता क्लास रूम में आ के बैठ गयी। उसने कभी समीर को इस नज़र से नहीं देखा, न कभी सोचा। पर उसके प्रपोज का ये अंदाज उसे गुदगुदा गया।

अंकिता उठती है, वापस अपने लिए चाय बनाती है। चाय के हल्के-हल्के सिप लेते हुए उसकी आँखों में दूसरा चित्र आता है।
यूनिवर्सिटी में उसका एक साल सीनियर- 'अतुल' उसके गीतों और कविताओं की साडी यूनिवर्सिटी दीवानी है। सांवले और सौम्य अतुल को इस वर्ष उभरते हुए युवा कवि के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

उसके लेखन से अंकिता भी प्रभावित है और शायद उसकी तरफ आकर्षित भी है। कई बात उन दोनों की मुलाकात यूनिवर्सिटी के एकांत में होती है, और उस वक़्त अतुल, अंकिता को अपनी प्रेम कवितायें सुनाता है। जो अंकिता के दिल में गुदगुदी पैदा करती है।

आज लंच टाइम के बाद जब वो लाइब्रेरी में बैठी थी, तभी वहां अतुल आ जाता है। और कई कवितायें सुनाने के बाद झिझकते-शर्माते अंकिता को प्रपोज करता है।

- एक ही दिन में अंकिता को दो लोग प्रपोज करते है, जिन्हें वो आजतक अपना मित्र मानती आई है। पर उनमें से न जाने क्यूँ उसे अतुल ज्यादा भाता है। सौम्य और शांत। देश का सबसे ज्यादा उभरता हुआ कवि। जब वो बिस्तर पर लेट कर अतुल और समीर की तुलना करती है, तो खुद को अतुल के ज्यादा करीब पाती है। उसका भविष्य यकीनन अतुल के साथ सुरक्षित है, क्यूँ की वो एक स्थापित साहित्यकार हो चूका है। जबकि समीर एक स्ट्रगलर है और उसके खुद के भविष्य का ठिकाना नहीं है। सो वो फैसला करती है,अतुल के प्रपोज को स्वीकार करने का। अंकिता बिस्तर पर करवट लेती है वैसे ही उसके दीमाग में विचार भी करवट लेते है।

अंकिता एक बार उन दोनों को करीब से जानना चाहती है, कोई अंतिम फैसला करने से पहले। परसों उसका बर्थडे है। उस दिन वो अपने दोनों प्रेमियों में से किसी एक से मिलने का प्लान करती है।

पर इस बार वो समीर को प्राथमिकता देती है। क्यूँ की उसने उसे पहले प्रपोज किया है। अंकिता फ़ोन उठती है और कांपते हाथों से समीर का नंबर डायल करती है।

- हैल्लो ! समीर बोलता है, अरे इतनी रात को अंकिता क्या कुछ प्रोब्लम तो नहीं हुई।

- नहीं-नहीं समीर सब ठीक है, बस मैंने आपको इनवाइट् करने के लिए फ़ोन किया था। और फिर अंकिता उसे अपने बर्थ डे के लिए आमंत्रित करती है। जिसे समीर हँसते हुए कबूल कर लेता है।

- अंकिता मोबाइल डिसकनेक्ट करने से पहले बोलिती है तो फिर ठीक शार्प ग्यारह बजे आप पहुँच रहे है।
- रात के ग्यारह बजे न, समीर कन्फर्म करता है।

- हाँ यार क्यूँ की मैं रात ग्यारह बजे ही पैदा हुई थी, अंकिता थोड़ी शोखी से बोलती है।

उस दिन समीर, अंकिता को फ़ोन करता है दोपहर को, पूछता है- बर्थडे की सब तैयारी हो गयी और क्या सब लोग इनवाइट् हो गए है।

- हाँ सब तैयारी हो गयी है- अंकिता बोलती है पर मेरे इस बर्थडे पर सिर्फ आप इनवाइट् है।
- सिर्फ मैं - समीर थोडा चौकता है।

- हाँ, अंकिता इतना ही बोल पाती है, की नेटवर्क प्रोब्लम की वजह से फ़ोन कट जाता है। थोड़ी देर ट्राई करने के बाद अंकिता अन्य कामों में व्यस्त हो जाती है।

आज अंकिता ने टी-शर्ट और स्कर्ट पहनी है, घुटने के उपर स्कर्ट। उसने एक दिन नाटक में समीर की नायिका को ऐसी ही ड्रेस में देखा था। वह आज समीर को अच्छी तरह से समझना चाहती है। टेबल पर उसने केक सजा दिया है, वहां सिर्फ दो चेहरे है। अंकिता की गोरी कलाई में बंधी घडी की सुइयां अब ग्यारह बजाना चाहती है।

अंकिता, समीर को याद दिलाने की गर्ज से उसे फ़ोन करती है, उधर से समीर कहता है, बस डियर पहुँच रहा हूँ, थोडा ट्राफिक में हूँ।

घडी की सुइयां ग्यारह क्रॉस कर चुकी है। समीर का फ़ोन नॉट रिचेबल है। अंकिता बेचैनी से टहलती है फिर बैठ जाती है।
अंकिता की आँख खुलती है, वो टेबल पर ही सर रख कर सो गयी थी। घडी पर नज़र डालती है तो तीन बज चुका है। समीर का फ़ोन अब भी नॉट रिचेबल है। अंकिता के चेहरे पर गुस्सा झलक पड़ता है। वो पैर पटक कर उठती है। और तेज़ क़दमों से टहलने लगती है। उसे समीर की इस अदा पर नफरत होने लगती है, और वो गुस्से में अतुल का नंबर डायल करती है।

केक खिलने के वक़्त अतुल के हाथ से केक फिसल कर अंकिता की शर्ट पर गिर जाता है। अंकिता अभी आती हूँ, कह कर वाश रूम की तरफ चली जाती है।
टी-शर्ट उतार कर वो उस पर लगे केक को साफ़ कर रही है, तभी वहां अतुल आ जाता है। सी एफ एल की रौशनी में अंकिता की नंगी पीठ और कंधे दूध की तरह चमक रहे है।

अतुल आगे बढ़ कर अपने होंठ अंकिता के कंधे पर रख देता है। अंकिता चिहुंक कर पलटती है तो बेलिबास उरोज अतुल के सीने में दुबक जाते है। अतुल उसे भींचते हुए आई लव यू अंकिता कहता है।

- आई लव यू टू - अंकिता के होंठो से सिसकारी के साथ निकलता है।

अतुल, अंकिता को गोद में उठा कर उसे बिस्तर पर लाकर लिटा देता है। इस वक़्त उसकी आखें बंद है और सांसे तेज़ है। वो अतुल को अपने बगल में महसूस करती है। कोई विरोध नहीं। अतुल के हाथों की हरकतों के आगे वह समर्पित हो जाती है। और अपने कौमार्य को उसके हवाले कर देती है।

किसी कवि सम्मलेन में जाने के लिए अतुल सवेरे छ: बजे अंकिता के रूम से निकलता है, दरवाज़े पर वो पानी नयी-नवेली प्रियतमा के होंठो को आधुनिक किस करता है।

अतुल को विदा करके, अंकिता वापस निढाल शरीर के साथ बिस्तर पर सो जाती है।

कई बार डोर बेल बजने के बाद उसकी आँख खुलती है। कोई बदस्तूर डोर बेल बजा रहा है। अंकिता झुंझुला कर उठती है। डोर खोलती है तो सामने समीर है। हाथ में फूलोंके गुलदस्ते के साथ।

अंकिता तंज लहजे में कहती है, अब क्या लेने आये हो, मेरा बर्थडे रात के ग्यारह बजे था, दिन के नहीं। इतना बोल कर वो वापस दरवाज़ा बंद करने को होती है पर समीर उसे के तरफ करके अन्दर आ जाता है।

टेबल पर रखे केक को समीर ऊँगली में लेके चखता है। फिर अंकिता के सामने घुटनों पर बैठ जाता है।
हाथ का गुलदस्ता उसकी तरफ बढ़ा के समीर कहता है- हैप्पी बर्थडे डियर।

- 'डोन्ट काल मी डियर '- इतना कह कर अंकिता घूम कर खड़ी हो जाती है।

उसके पीछे खड़े होकर समीर कहता है- मैं जनता हूँ आप नाराज़ है, मेरी वजह से आपका बर्थडे सेलिब्रेट न हो पाया।

पर मैं क्या करूँ अंकिता रात बहुत काली होती है। इतनी की इसमें जिंदगियां काली हो जाती है। जरा सोचो जब लोगों को मालूम पड़ता सारी रात हम साथ थे बंद कमरे में तो लोग न जाने क्या-क्या तुम्हारी पवित्रता के बारे में अफवाहें फैलाते। मैं कैसे सुन पाता ये सब तुम्हारे बारे में जिसे मैं प्यार करता हूँ।

- कुछ पलों बाद वो बोली - समीर तुम तो रात में चमकते सूरज की तरह, मैं तुम्हें जान ही न पाई। अब मैं तुम्हारे लायक नहीं क्यूँ की मैं रात में नहीं सुबह लुटी हूँ। सुबह की कालिमा में। इतना कह कर वो वहीं ज़मीन पर रोते-रोते गिर पड़ी। उसने एक महान इंसान को पहचानने में गलती कर दी थी।

कुछ लम्हों बाद समीर ने उसे उठा कर चेयर पर बैठाया और बोल- मैं अब भी अपने प्रपोज का जवाब मांगता हूँ, क्या मुझसे शादी करोगी तुम ?

कुछ बोल न सकी वो। उसे चुप देख समीर बोला- ठीक है तुम आराम से सोच के बताना कल या फिर ओर कभी, अभी मैं चलता हूँ। और वो पलट कर चल दिया।
अंकिता जाते हुए देवता को देख रही थी और फिर भाग कर वो समीर की पीठ से चिपट गयी और उसके होठ बार-बार यही दोहरा रहे थे-

'' हाँ मैं तुमसे शादी करुँगी’’,’’ हाँ मैं तुमसे शादी करुँगी ''
 --Sudheer Maurya 'Sudheer'

Janhit India Oct 2013  ke ank me Prkashit. Aur Kahani Sangrah 'Karz aur any kahaniya' me sammilit.

Thursday, 12 September 2013

सुधीर मौर्य की कहानी - पीड़ा

वो बिस्तर पर बार-बार करवटें लेती है, सोने का प्रयत्न करती है किन्तु असफल होती है। उसकी आंखों में नींद नहीं है, नींद की जगह तो उसके चेहरे ने ले ली है, खुली आंखों से वो उसके ख्वाब देख रही है, आंखे बन्द करती है तो लगता है बिस्तर पे वो अकेली नहीं साथ में वो भी लेटा है, उसके बदन को सहलाते हुए और वो उसकी बाहों में पिघलती जा रही है। वो झट से आंखे खोल देती है, इधर-उधर नीम अंधेरे में नजर गड़ाती है, वो दिखाई नहीं देता है।
उसी का सहपाठी है, विदेश एम.ए. हिन्दी साहित्य, दोनों के सेम सबजेक्ट, सेम सेक्शन। पूरी यूनिवर्सटी में उसकी शायरी और कविता के चर्चे हैं, तमाम लड़कियां उस पर मरती है। पर वो उस पर मरता है। हां वो दोनों दोस्त है, पर वो उससे दोस्ती से कुछ ज्यादा मांगता है। आज उसकी किताब में, एक पर्ची मिली थी, कुछ पक्तियां लिखी थी शायद कविता थी- सीमा जी- सेक्सी तू सेक्सी सरापा तू सेक्सी.....
पढ़कर रोम-रोम सिहर जाता है सीमा का, जरूर विरेश ने रखा होगा उसके बाद सीमा का मन यूनिवर्सटी में नहीं लगता है। बेचैन होकर वो उठती है किताब खोलकर वो पेज निकालती है, वापस पढ़ती है- सेक्सी तू सेक्सी सरापा तू सेक्सी
उसकी आंखे अपने आप बंद हों जाती है, अजब सी गुदगुदी वो महसूस करती है। विरेश को बचपन से जानती है सीमा, बचपन न सही टीनऐज से तो जानती है। नाइन्थ से दोनों साथ पढ़ रहे है, विरेश को बचपन से शौक है कविताएँ लिखने का पढ़ने का। उस पर आरोप है, वो बल्गर कविताएँ लिखता है। सीमा के पिता भी कवि है, प्रतिष्ठित कवि और वो विरेश को कवि नहीं मानते। सीमा वापस किताब खोलती है बेड पर आकर अधलेटी स्थिति में वो कविता की आगे की लाइने पढ़ती है।
तेरी आंखे है कजरारी तेरी बाते प्यारी-प्यारी लगती आग का है गोला तू जब बांधती है साड़ी
सीमा की वापस आंखे बन्द हो जाती है। वो याद करती है, यूनिवर्सटी के पिछले साल का वार्षिक समारोह उसने बी0ए0 फाइनल में टॉप किया था और विरेश किसी तरह से पास हुआ था। उस दिन सीमा ने साड़ी बांधी थी फिरोजी रंग और उसी रंग का स्लीवलेस ब्लाउज। उसने मैंचिग के सैंडल पाव में और हांथो में बैंगल पहने थे।
उस दिन विरेश उसे बार-बार देख रहा था, करीब आ रहा था और बगल से निकलने के बहाने उसके शरीर से अपने शरीर को टच कर रहा था। उस दिन विरेश भी कविता पाठ करता है-
स्नेह तुम्ही से मेरी प्रिया तुम मन को मेरे देखो तुम
फंक्शन के दौरान जब सीमा चाय पी रही थी तो उसे अकेला देखकर विरेश उसके पास आ गया था, और उसे ये बोलते हुए कि वो साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही हो, बेहिचक अपने प्यार का इजहार कर दिया था। -कुछ देर सीमा चुप रह गई थी, तो विरेश ने उसके गाल पर आई एक जुल्फ की लट संवार दी थी। -सीमा फिर भी चुप रही थी, तभी वहां उसकी कुछ सहेलियां आ गई थी वो विरेश इधर-उधर की बातें करने लगा था। सीमा को विरेश की ये डेयरिंग थोड़ी-थोड़ी अच्छी लगी थी, पर वो थोड़ा सा डर भी गई थी। सीमा, विरेश के हाथ का स्पर्श अपने गाल पर याद करके सिहर जाती है, वो एक तकियो को सीने से लगा कर और एक तकिये को अपनी मांसल जांघो के बीच रख कर सोने की कोशिश करती है। उसे महसूस होता है मानो, उसके सीने से विरेश चिपका हुआ और उसने अपनी टांगो को उसकी जांघो के बीच फंसा रखी है। ये महसूस करते ही उसके होंठांे पर मादक हंसी तैर जाती है, और मुस्कराते हुये दोहराती है-
सेक्सी तू सेक्सी सरापा तू सेक्सी
आज सीमा को यूनिवर्सटी जाने की देर हो गई है, सुबह देर से आंख खुली थी। रात देर से जोे सोई थी वो। आदमकद आईने के आगे खड़े होकर बाल बनाते हैं वो, हल्के घुंघराले काले बाल कांधे तक बिखरे हुए। बाल बनाते हुए वो गुन गुनाती है-
सेक्सी तू सेक्सी सरापा तू सेक्सी
-मां उसे आवाज देती है-सीमा आ बेटे नाश्ता तैयार है। -सीमा शायद सुन नहीं पाती है या सुन कर अनसुना कर देती है। वैसे ही वो कविता की लाइने गुनगुनाती रहती है। कोई पीछे से आकर उसके कांधे हिला देता है, वो चौक कर पलटती है। सामने मां है, पूछती है-क्योंरी सीमा आजकल तेरा ध्यान किधर रहता है, वे पलट कर वापस आईना देखते हुए बोलती है, कुछ नहीं मां तू चल मैं आती हूं।
आज उसे विरेश कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है, वैसे तो वो उसे यूनिवर्सटी आते ही दिखाई दे जाता है मानो वो उसका ही इन्तजार करता रहता है, वो यूनिवर्सटी के हॉस्टल में रहता है सो कभी लेट नहीं होता। वो चारों तरफ निगाहों से ढूंढती हुई क्लास तक आती है। उसकी नजर ग्रीन बोर्ड पर जाती है। जहां सफेद चाक से लिखा था। -दिल ने किया हमनवा एक बिरहमने बुत को- पढ़कर कर सीमा थोड़ा लजाती है, क्लास में ओर भी स्टूडेन्टस बैठे हैं। सीमा अपने होंठों में अपना दंउ लेती है-सीमा मिश्रा, वो दो तीन बार दोहराती है-सीमा मिश्रा। हां वो भी तो ब्राह्मण है तो क्या विरेश ने उसके लिए लिखा है। हां सीमा पहचानती है विरेश की राइटिंग को, क्या सुन्दर लिखता है वो। विरेश, क्लासरूम में आता है। हाफ बांह का कुर्ता और पायजामा पहना है उसने, हां आज दिखने में कवि लगता है। वो क्लास में पीछे बैठता है और सीमा आगे। अपनी सीट की तरफ जाने से पहले वो सीमा के पास रूकता है। उसकी किताब पर हाथ रखते हुए बोला, कविता पढ़ी थी सीमा। सीमा के हृदय में गुदगदी होती है पर वो चुप रहती है। विरेश गुनगुनाता है- सेक्सी तू सेक्सी सरापा तू सेक्सी
-विरेश जाकर अपनी सीट पर बैठ जाता है तो सीमा की धड़कन थोड़ी नियन्त्रित होती है। वो विरेश की डेयरिंग पर अक्सर डर जाती है। आज यूनिवर्सटी में थोड़ा हंगामा हो जाता है। ग्रीन बोर्ड पर लिखी कविता की लाइन- दिल ने किया हमनवा एक बिरहमन बुत को- सारी यूनिवर्सटी में चर्चा कि विषय है। चर्चा इस बात की नहीं कि कविता में शास्त्रीयता है या नहीं, चर्चा इस बात की है, ब्राह्मण की लड़की को कोई नीची जात वाला हमनवा कैसे कर सकता है। हां विरेश, नीची जाति का है। विरेश-विरेश गौतम। सीमा को पता चलता है, तमाम अगड़ी जात के प्रोफसरांे के ये कृत्म भाया नहीं हैै और वो लामबन्द हो रहे है। सीमा थोड़ी चिन्तित होती है। विरेश के लिए, उसकी चिन्ता विरेश के लिए क्यों है वो नहीं समझ पाती है। क्या लगता है आखिर विरेश उसका। उधर, शेडयूल कास्ट के लोग भी लामबन्द हो रहे है। विरेश के फेवर में, वो विरेश को न डरने की सलाह देते है। विरेश, उन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता है। उसे लगता है उसे ये फील होता है वो सीमा को प्यार करने लगा है। उसने तो सीमा को प्रपोज भी किया है, पर उसने अब तक उसे कोई जवाब नहीं दिया है। विरेश थोड़ा निराश होता है। ये सोचकर उसे थोड़ी तसल्ली होती है सीमा ने उसे मना भी तो नहीं किया था।
आज घर में सीमा को कुछ आंखे चुभती हुई लगती है। उनमें दो आंखे उसके पिता की है, जो यूनिवर्सटी मंे हिन्दी के प्रोफेसर हैं, दबंग, लब्ध प्रतिष्ठित कवि। उनकी दबंगई उनकी कविताओं मंे आसानी से देखी जा सकती है। और दो आंखे उसके भाई की हैं जो एक प्रकाशक है, वो भी दबंग। आज तक उसके प्रकाशन से किसी निम्न जाति के लेखक की कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है। पिता, सीमा को देखकर कड़क कर अपनी पत्नी को बोलते हैं, जरा समझा दो छोकरी को, अपने पांव संभाले, वरना वो अपने पांव पर चल न सकेगी। सीमा देखती है उसकी भाई अपनी बांहे चढ़ाता है, जिसका अर्थ वो ये लगाती है, मतलब वो पिता की कही बात का सर्मथन कर रहा है।
सीमा चुप रहती है और अपने कमरे में आ जाती है। निढ़ाल बिस्तर पर ढ़ेर हो जाती है। कुछ पलांे बाद उसे महसूस होता है उसके गाल गीले हो रहे है, हथेली ले जाकर देखती है तो कुछ बंूदे वहां आंखों के कोने से निकल कर वहां ढलक रही थी।
वो अश्रु थे, पर क्यों किसके लिए।
सीमा खुद अचम्भित है, अपनी आंखो के इस कृत्य पद;चंतद्ध। क्यों आखिर क्यों आंखो से उसकी आंसू निकल पड़े है। क्या विरेश के लिए। क्या ये सोचकर कि उसका अहित होने वाला है उसकी आंखे रो पड़ी हैं। वो विरेश से प्रेम करने लगी है क्या, हां उस दिन वो बोल रहा था ऐ सेक्सी एक बार आई लव यू बोल दे। सीमा के मन में विरेश की बात से बहुत गुदगुदी होती है। उसके गुलाबी अधरों पर मुस्कान तैरना चाहती है पर वो रोक लेती है। उसे शांत देखकर विरेश उसके हाथ पकड़ लेता था। उसकी इस डेयंरिग पे सीमा हड़बड़ा जाती है। नजरे नीची करके बोलती है विरेश जी हाथ छोड़ दीजिए, मैं आपकी एक अच्छी मित्र हूं। -फिर बोल दो न आई लव यू-विरेश उसके हाथ पर अपने हाथ की सख्ती बढ़ाते हुए बोलता है। सीमा को तनिक दर्द होता है, पर उसे ये दर्द बड़ा भला लगता है। तभी सीमा की सहेली मीता वहां आ जाती है, तो विरेश उसका हाथ छोड़ देता है। मीता थोड़ी चंचलता से विरेश से कहती है, क्या यार विरेश ऐसी ही गोल्डन नाईट को सीमा का हाथ छोड़ देंगे क्या। मीता की बात पर विरेश हंस देता है और सीमा उसको तो लाज से कान की लौ लाल हो जाती है। सीमा सोचती है नहीं वो प्रेम नहीं करती है विरेश से और अगर करती भी है तो वो उससे कभी बोल नहीं सकती वो जानती है उसे समाज के बनाये अंधे तिलिस्म में ही जीना है।
आज यूनिवर्सटी में बड़ा बवाल हुआ है, और शाम होते-होते वो अपने कमरे में और विरेश हॉस्पिटल में होता है। आज सुबह एम.ए. फर्स्ट ईयर हिन्दी साहित्य के क्लास के ग्रीन बोर्ड पर लिखा होता है- ‘‘दिल ने किया हमनवा एक बिरहमने बुत को तो कौम के फरजन्दो की नजरें बदल गई’’ पढ़ कर सीमा लरज जाती है। मीता बताती है उसे कल शाम कुछ लोगों ने, विरेश को डराया-धमकाया है और तुमसे बात न करने की सख्त हिदायत दी है। विरेश क्लास रूम में आता है, सीमा के पास रूक कर बोेलता है, हैलो सेक्सी आई लव यू- आई लव यू बोलने के समय विरेश की आवाज थोड़ा तेज हो जाती है और वो शब्द सारे क्लास में गूंज जाते हैं। पूरा दिन सीमा, विरेश से बचने का प्रयास करती है। वो जानती है विरेश की डेयरिग को, वो जरूर उसे छेड़ेगा। ये बात अलग है विरेश का छेड़ना उसे अब बहुत भला लगता है।
सीमा देखती है आज पूरी यूनिवर्सटी में तनाव है। लोग जगह-जगह, झुन्ड बना कर बातें कर रहे है। वो इस तनाव के कारण का अंदाजा लगाती है, जरूर उसके और विरेश के बारे में बाते हो रही होंगी। सीमा थोड़ा सहम जाती है वो आज घर जल्दी आ जाती है, उसके पिता और भाई दोनों पे समय घर पर नहीं है। मां की दी चाय तिपाई पर पड़े-पड़े शरबत हो जाती है। सीमा इस वक्त अपने होश-ओ-हवाश में नहीं है। मीता के फोन ने उसे तोड़ कर रख दिया है। आज शाम यूनिवर्सटी के बाहर कुछ लोगों ने अचानक विरेश पर हमला कर दिया है, उसे काफी चोटे आई हैं, और उसे पास के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
उसका मन विरेश को देखने का करता है, ऐसा कर नहीं पाती है। कहीं न कहीं उसके मन में अपने पिता और भाई का डर बैठा है। वो जानती है ये कृत्य किसका है।
खाने की मेज पर आज रात उसके पिता और भाई ठहाके लगाते है, ये ठहाके सीमा के हृदय में नश्तर की तरह चुभते है, वो मां से तबियत खराब होने की बात करके खाने की मेज से उठ जाती है। उसके कानों में पिता की आवाज सुनाई पड़ती है, अब अगर वो सीमा से मिला तो दुनिया से उठ जायेगा। सीमा झुरझुरी लेती है। रात भर बिस्तर पर वो करवटंे लेकर बिताती है, विरेश के बारे में सोचती है। उसके दर्द के बारे में अदांजा लगाती है। आज उसे यूनिवर्सटी अधूरी लगती है। विरेश नजर नहीं आता है, कैसे आयेगा वो तो अस्पताल में है। क्लास का ग्रीन बोर्ड आज सूना पड़ा है। लंच टाईम में मीता उससे बोलती है, चल विरेश को देखने चलते है। सीमा मनाकर देती है। दो कारण है विरेश के पास न जाने के एक तो वो सोचती है नजर कैसे मिलायेगी विरेश से और दूसरा पिता और भाई का डर सताता है उसे।
मीता हॉस्पिटल जाती है, तो सीमा घर वापस आ जाती है। वो मीता के फोन का इन्तजार करती है, जानना चाहती है विरेश के बारे में। बार-बार मोबाईल उठा कर चेक करती है उस पर उसमंे कोई फोन कॉल नहीं है। सारी रात सीमा आंखो में काटती है, आज सीने से तकिया लगा कर, जांघो के बीच तकिया रखकर भी नींद नहीं आती है। मीता उसे फोन नहीं करती है। सीमा सारी रात आंखो में काटती है। वो इन्तजार करती है रात ढ़लने का, सवेरा होने का। उसे जल्दी है यूनिवर्सटी जाने की, विरेश के बारे में जानने की। वो एक-दो बार मीता को फोन करती है, पर उधर से कोई जवाब नहीं मिलता है।
आज यूनिवर्सटी में रोज जैसी चहल-पहल नहीं है, कल की घटना का असर साफ दिखाई पड़ता है। आज यूनिवर्सटी में बहुत सी आंखे उसे चुभती हुई महसूस होती है। मानो कह रहीं है वही अपराधी है विरेश के इस हाल के लिए। वो मीता को खोजती है पर वो नजर नहीं आती है। सीमा का मन क्लास में नहीं लगता है।
वो लाइर्बेरी में आ जाती है, उसे किताब सबमिट करनी है। पुस्तक जमा करने से पहले वो उसे चेक करती है तो उसमें से एक कागज का पुर्जा उसे मिलता है। उसकी लिखावट को पहचानती हैं वो विरेश ने ही लिखा है। सीमा वहीं लाइब्रेरी में बैठकर वो लिखावट पढ़ती है, वो एक छोटी सी कविता है। जिसका अर्थ ये है, नायिका, नायक को इसलिए तिरस्कृत करती है क्योंकि वो निम्न जाती का है। कविता पढ़कर सीमा की आंखे डबडबा जाती है। शाम ढ़लते-ढ़लते और सीमा के यूनिवर्सटी से निकलने के समय पर उसे एक और खबर मिलती है। यूनिवर्सटी के मैनेजमेन्ट काउंसिल ने निर्णय लिया है विरेश को यूनिवर्सटी से निकालने का। वजह में कहा गया कि विरेश, यूनिवर्सटी का माहौल बिगाड़ रहा है। वो पढ़ाई से ज्यादा समय लड़कियों को फ्लर्ट करने में लगाता है। इन बातों का ताकीद उसके अंकपत्र भी करते हैं। सीमा के लिए ये खबर नहीं वज्रपात है। उसको अपना दिल बैठता हुआ महसूस होता है और टांगे लरजती हुई। उसके घर का माहौल आज शाम खुशनुमा है। पिता और भाई किसी बात पे ठहाका लगा रहे हैं। ये ठहाके सीमा के कान में पिघले शीशे की तरह उतरते हैं। वो डिनर में मुश्किल से एक चपाती खाती है, वो भी उसके हलक से नहीं उतरती है। किसी तरह से वो उसे पानी के साथ हलक से नीचे उतारती है। फिर वो पिता और भाई की नजर बचा कर अपने कमरे में आ जाती है। आज रात भी नींद सीमा की दुश्मन बनी हुई है। सीमा सोचती है जिंदादिली की ये सजा मिली है विरेश को। जरूर इस सजा की वजह खुद सीमा है। वो विरेश के सारे खतो को ढूढंती है जो विरेश ने कोई न कोई बहाने से सीमा की किताब में रखे थे। सीमा बारी-बारी से सारे खत पढ़ती है और आखिरी खत पढ़ते-पढ़ते उसे लगता है, वो विरेश को प्यार करती है, उसी को चाहती है। वो होंठों में बोलती है-विरेश आई लव यू। यही सेनेटेन्स को कई बार दोहराती है और लजाती है और एक निर्णय लेती है।
दो महीने बीत चुके है, विरेश स्वस्थ हो गया है, पर टूट गया है, एक भाड़े के कमरे में रहता है। वो बच्चो को ट्यूशन पढ़ाने लगा है। सीमा, उसका एड्रेस मीता से हासिल कर लेती है और एक शाम विरेश के कमरे तक पहुँच जाती है। विरेश उसे अपने कमरे पर देखकर सरप्राइज हो जाता है और सीमा उसके गले में बाहें डाल कर आई लव यू बोलकर उसे और सरप्राईज कर देती है।
तमाम गिले शिकवे के बाद जब उस सुहानी शाम सीमा प्रथम अमिसार की पीड़ा झेल रही थी, उस समय उसे लग रहा था, वो अपने पिता और भाई से विरेश की पीड़ा का बदला ले रही है।
सुधीर मौर्य के कहानी संग्रह 'अधूरे पंख' से                                                                                                                                                                    Sudheer Maurya 'Sudheer' Ganj Jalalabad, Unnao 209869